Wednesday, February 4, 2009

और दोस्त तेरी याद आ गई......

आज सुबह जब आँख खुली,
मौसम थोड़ा सुहाना था,
चारो ओर गहरी धुंध थी,
और जमीं पर सुनहरी धुप का आशियाना था,
याद आया वो जमाना,
जब हम साथ बैठते थे,
दोनों हांथों की हथेलियों को,
आपस में रगड़ के गर्म किया करते थे,
और दोस्त तेरी याद आ गई,
मौसम ने थोडी करवट ली,
सुनहरी धुप अब तीखी हो गई,
याद आता है पसीने से हम लतपत,
हो जाते थे फिर भी,
अपनी मगन में रास्तों पे चले जाते थे,
उस वक्त किसे परवाह होती थी,
भूख और प्यास की,
क्लास-रूम की खिड़की से आती हुई,
गर्म हवा के झोकों में,
अपने भविष्य से अनजान,
अपनी बनायी हुई हवाई-किले याद आ गई,
और दोस्त तेरी याद आ गई,

रिम-झिम बारिश की फुहारों में,
पहाड़ की उस ऊँची पत्थर पे,
तबियत ख़राब होने के डर से बेफिक्र,
गिले बदन घंटों बैठे रहना याद आ गई,
और दोस्त तेरी याद आ गई,

हाँ दोस्त तेरी याद आ गई........



---------------------नीरज शर्मा--------------------

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