
ज़िन्दगी कुछ इस तरह बदल जायेगी,
ये सोचा ना था...
जिन गलियों में बिताया था बचपन,
वो पीछे छुट जाएँगी,
ये सोचा न था...
आज चाहे जिस मुकाम पर,
पहुँच गया हूँ,
लेकिन अपनों से दूर हो जाऊंगा,
ये सोचा न था...
नानी की कहानियो में,
कभी बचपन गुजरा था,
लोरी की थपकियों को,
यूँ याद करता हुआ,
रात-रात भर जगता हूँ,
ये सोचा न था...
यूँ तो रात भर,
सोता हूँ मैं आज भी,
पर जो सुकून,
नाना की गोद में पाया था,
उसे खो दूंगा,
ये सोचा न था...
जिस शहर की गलियों में,
बार-बार जाने को दिल करता था,
और गर्मी की छुट्टी ख़त्म होने पर,
अगली छुट्टी के लिए,
पुरे साल एक-एक दिन,
गिना करता था,
वो बचपन,
वो इंतजार,वो शहर से,
यूँ दूर चला जाऊंगा,
ये सोचा न था...
राबड़ी,मलाई,छेना की मिठाइयां और प्याओ,
खाने को तो आज भी,
खरीद कर खा लेता हूँ,
पर घर वालों की नज़रों से बचा कर,
आधी नींद से मुझे उठा कर,
बड़े प्यार से मुझे,
कोई अब नहीं खिलायेगा,
ये सोचा न था...
यूँ तो आज भी दूर रहता हूँ,
मैं अपने घर से,
और जब भी छुट्टी मिलती है,
चला जाता हूँ घर,
लेकिन पुरे साल,
मुझसे ज्यादा मेरी छुट्टी का इंतजार,
करता हुआ दरवाजे की चौखट पर,
अब कोई भी न होगा,
ये सोचा न था...
यूँ तो आज भी,
धूप उतरती है,
घर की छत पर,
और रात के अंधेरे में,
ओश की बूंद,
गिरती है आँगन में,
पर छत पे उतरने वाली,
धूप का इंतजार,
और ठण्ड से बचने के लिए,
आँगन में बैठ कर,
बोरसी की आग तपना,
भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
आज भी हर साल,
खिचड़ी का त्यौहार मनाता हूँ,
और कभी-कभी लिट्टी भी खा लेता हूँ,
पर लकड़ी वाले चूल्हे पर,
मिटटी के बर्तन में बनी हुई खिचड़ी,
और गोबर के उपलों की आग
में,पकी हुई लिट्टी की सोंधी स्वाद को,
भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
यूँ तो आज भी,
तारों से भरा आसमान देखता हूँ,
पर गर्मी की रात में,
छत
पर बिछी हुई खटिया पे लेते हुए,
तारों को निहारना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
बरसात तो आज भी आती है,
और सड़कों पर पानी भी भरता है,
पर घर की चौखट पर बैठ कर,
सड़क पर पानी भरने का इंतजार करना,
और उस गंदे पानी के तेज बहाव में,
अपनी छोटी
सी कागज की नाव को,
बहाना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
यूँ तो आज भी हर रोज़,
मैं औफिस जाता हूँ,
पर स्कूटर की पिछली सिट पर बैठ कर,
कभी-कभी दुकान जाने की,
उस उमंग को भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
जाती हुई रेलगाड़ियों को तो,
आज भी मैं देखता हूँ,
लेकिन दुकान पर,
ट्रेन की हार्न की आवाज़ सुनते ही,
नाना की गोद से उतर कर भागना,
और तालाब के किनारे से,
पटरी पर जाते हुए रेलगाड़ियों के डब्बे,
गिनना भूल जायूँगा,
ये सोच न था...
कभी-कभी आज भी,
कहीं किसी मन्दिर में,
बजती हुई भजन की आवाज़,
मुझे सुने देती है,
लेकिन घर के सामने वाले गुरुद्वारा से ,
आती हुई गुरुवाणी की आवाज़ से,
दिन की शुरुआत करना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
मन्दिर की सीड़ियों पे आज भी चढ़ता हूँ,
और भगवन के दर्शन करता हूँ,
लेकिन गुरुद्वारा में मिलाने वाले,
घी से लबालब आटे का हलुआ और चने की घुघनी का प्रसाद,
खाना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
औफिस में बैठे हुए कम के बोझ और आलस से,
अब भी दिन में हलकी झपकी आ जाती है,
लेकिन दोपहर के खाने के बाद,
रेडियो पर लोकगीत सुनते हुए,
चटाई पर सोना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
तकिये के बिना आज भी मुझे,
नींद नही आती है,
और कभी-कभी पेट के बल भी सो जाता हूँ,
पर,नाना की बांह पर अपना सर,
और उनके पेट पर अपना पैर चढाकर,
सोना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
आज महीने के अंत में,
तनख्वाह मिलने की खुशी तो मुझे होती है,
लेकिन हर रोज सुबह,
मिलने वाली अठन्नी या,
एक रुपये का सिक्का से,
चेहरे पे आने वाली मुस्कान को भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...
आज भी मैं हँसता हूँ,
और दूसरो को भी हँसता हूँ,
लेकिन अपनी गोद में बिठा कर,
उंगली से गुदगुदा कर,
अब कोई मुझे नही हसांएगा,
ये सोचा न था...
मालूम है मुझे,
ज़िन्दगी स्थिर नही होती,
पर ज़िन्दगी के सुनहरे पल,
यूँ भूल जाऊंगा,
ये तो कभी भी सोचा न था...
-----------Neeraj Sharma----------
In the sweet memory of my Dearest "NANA". Please don't copy of this poem.