Wednesday, February 4, 2009

और दोस्त तेरी याद आ गई......

आज सुबह जब आँख खुली,
मौसम थोड़ा सुहाना था,
चारो ओर गहरी धुंध थी,
और जमीं पर सुनहरी धुप का आशियाना था,
याद आया वो जमाना,
जब हम साथ बैठते थे,
दोनों हांथों की हथेलियों को,
आपस में रगड़ के गर्म किया करते थे,
और दोस्त तेरी याद आ गई,
मौसम ने थोडी करवट ली,
सुनहरी धुप अब तीखी हो गई,
याद आता है पसीने से हम लतपत,
हो जाते थे फिर भी,
अपनी मगन में रास्तों पे चले जाते थे,
उस वक्त किसे परवाह होती थी,
भूख और प्यास की,
क्लास-रूम की खिड़की से आती हुई,
गर्म हवा के झोकों में,
अपने भविष्य से अनजान,
अपनी बनायी हुई हवाई-किले याद आ गई,
और दोस्त तेरी याद आ गई,

रिम-झिम बारिश की फुहारों में,
पहाड़ की उस ऊँची पत्थर पे,
तबियत ख़राब होने के डर से बेफिक्र,
गिले बदन घंटों बैठे रहना याद आ गई,
और दोस्त तेरी याद आ गई,

हाँ दोस्त तेरी याद आ गई........



---------------------नीरज शर्मा--------------------

Saturday, January 17, 2009

सच....



ज़िन्दगी अभी रुकी नही,
साँस अभी थमी नही,
तुम अभी जीते नही,
मैं अभी हारा नही,
माना कुछ अनकही बातों की,
कहानी बनती गई,
हम तो ठहरे रहे,
पर दूरियां बढती रही,
लेकिन सच है एक बात,
तुम ग़लत नही,
और मेरी गलती नही,
सच है मैं तुम सा नही,
थोड़ा बचपना है मुझमे,
मैं तुम सा समझदार नही,
पर कोई तुमसा नही हो सकता,
इस बात से भी,
मैं अनजान नही,
बात ये नही कैसे मैं जाने दूँ,
सच तो ये है की क्यूँ तुम्हे जाने दूँ?

मुझे और तुम्हे ही क्या,

इस रिश्ते को तोड़ देने का,

हक तो उपरवाले को भी नही....

Monday, January 12, 2009

दो लम्हा...


जब चूम के तेरे माथे को,

मेरी नज़रो में जो तेरी इज्ज़त है,

उसे मैंने बताया था,

और......

तेरे दिल में जो,

मेरे लिए प्यार है,

हौले से मेरे गालों पर,

अपनी दांतों से काट कर,

मुझे जताया था,

उस लम्हे को,

कैसे मैं अपनी जिंदगी में,

सम्भाल रखूं,

उस दो पल के,

प्यार के बदले,

तुझे क्या दूँ,

ये तू ही मुझे बता दे........


सोचता हूँ,

उस छोटी सी मुलाकात को,

जब हम यूँ ही,

अचानक मिल गए,

कुछ खास तो था वो लम्हा,

जब हम दोस्त बन गये,

कभी सोचा न था,

यूँ हम साथ-साथ चलेंगे,

एक-दुसरे को हम यूँ,

याद किया करेंगे,

इन यादों को कैसे,

मैं संभालूं,

इनके बदले,

तुझे क्या दूँ,

ये तू ही मुझे बता दे.........


जिस प्यार के एक कतरे के लिए,

कभी दुआ मांगी थी,

मैंने अपनी बंद लबों से,

शायद उसने सुन लिया होगा,

और मुझे प्यार कि बारिश में,

भिगों देने के लिए,

भेज दिया तुम्हे,

मेरी ज़िन्दगी में,

कैसे संभालूं इसे,

खुदा कि इस इनायत के बदले,

तुझे क्या दूँ,

ये तू ही बता दे मुझे..........


कल कि जिंदगी का भरोसा नही,

ना जाने हम-तुम कहाँ होंगे,

आंखों में थोडी नमी,

पर लबों पे मुस्कान लिए,

उस दो लम्हे कि,

यादों कि छाओं में,

सोते रहेंगे,

जब भी हम तनहा होंगे.....

इन दो लम्हों के बदले,

तुझे क्या दूँ,

ये तू ही बता दे मुझे.............
Neeraj Sharma

Thursday, December 18, 2008

बचपन के वो दिन....

ना जाने कब हम बड़े हो गए,
बचपन के वो दिन पीछे रह गए,
जब हम भी स्कूल जाया करते,
दोस्तों से रूठा मनाया करते,
उस वक्त भी हम अपने आप को बड़े समझते,
और किताबों के वजन को,
कन्धों पे ढोया करते,
ना जाने कब हम...
बचपन के वो दिन...

याद आता है वो क्लास-रूम,
जहाँ हम बैठा करते,
Science से कब्बडी,
और Maths से डरा करते,
Hindi की वो पकाऊ कहानियाँ,
और English के Poems से भागा करते,
Geography में Countries के नाम,
कभी याद किए नही,
और History की Period में सो जाया करते,
फिर भी पढ़ाई में ख़ुद को Genius समझते,
Examination Period में खूब पढा करते,
फिर भी नंबर के लिए,
रोया करते,
ना जाने कब हम बड़े...
बचपन के वो दिन...

पहली हीं Period में,
दोस्तों से लड़ जाया करते,
और पुरे दिन एक-दुसरे से,
बातें नही किया करते,
और आखरी Period में,
एक दुसरे को Sorry कहने के लिए,
फिर से लड़ा करते,
ना जाने कब हम...
बचपन के वो दिन...

Prayer Time में हम गायब रहते,
और Assembly-Hall में भी,
शैतानियाँ किया करते,
हर Period के अंत में Class-room से,
निकल जाया करते,
और Class Monitor पे भी,
अपनी धौस जमाया करते,
ना जाने कब हम...
बचपन के वो दिन...

जिस दिन हम Absent हो जाते,
Teacher भी खुश होते,
उन्हें भी पढ़ने का मौका मिलता,
दुसरे बच्चो को सिखाने का मौका मिलता,
हमारी शैतानियों पर,
Teacher भी मुस्कुराते,
और दिखावटी गुस्से में,
हमारी पिटाई भी लगते,
ना जाने कब हम बड़े हो गए...
बचपन के वो दिन पीछे रह गए...


----------Neeraj Sharma----------

Tuesday, December 16, 2008

सोचा ना था.....


ज़िन्दगी कुछ इस तरह बदल जायेगी,
ये सोचा ना था...
जिन गलियों में बिताया था बचपन,
वो पीछे छुट जाएँगी,
ये सोचा न था...

आज चाहे जिस मुकाम पर,
पहुँच गया हूँ,
लेकिन अपनों से दूर हो जाऊंगा,
ये सोचा न था...

नानी की कहानियो में,
कभी बचपन गुजरा था,
लोरी की थपकियों को,
यूँ याद करता हुआ,
रात-रात भर जगता हूँ,
ये सोचा न था...

यूँ तो रात भर,
सोता हूँ मैं आज भी,
पर जो सुकून,
नाना की गोद में पाया था,
उसे खो दूंगा,
ये सोचा न था...

जिस शहर की गलियों में,
बार-बार जाने को दिल करता था,
और गर्मी की छुट्टी ख़त्म होने पर,
अगली छुट्टी के लिए,
पुरे साल एक-एक दिन,
गिना करता था,
वो बचपन,
वो इंतजार,वो शहर से,
यूँ दूर चला जाऊंगा,
ये सोचा न था...

राबड़ी,मलाई,छेना की मिठाइयां और प्याओ,
खाने को तो आज भी,
खरीद कर खा लेता हूँ,
पर घर वालों की नज़रों से बचा कर,
आधी नींद से मुझे उठा कर,
बड़े प्यार से मुझे,
कोई अब नहीं खिलायेगा,
ये सोचा न था...

यूँ तो आज भी दूर रहता हूँ,
मैं अपने घर से,
और जब भी छुट्टी मिलती है,
चला जाता हूँ घर,
लेकिन पुरे साल,
मुझसे ज्यादा मेरी छुट्टी का इंतजार,
करता हुआ दरवाजे की चौखट पर,
अब कोई भी न होगा,
ये सोचा न था...

यूँ तो आज भी,
धूप उतरती है,
घर की छत पर,
और रात के अंधेरे में,
ओश की बूंद,
गिरती है आँगन में,
पर छत पे उतरने वाली,
धूप का इंतजार,
और ठण्ड से बचने के लिए,
आँगन में बैठ कर,
बोरसी की आग तपना,
भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

आज भी हर साल,
खिचड़ी का त्यौहार मनाता हूँ,
और कभी-कभी लिट्टी भी खा लेता हूँ,
पर लकड़ी वाले चूल्हे पर,
मिटटी के बर्तन में बनी हुई खिचड़ी,
और गोबर के उपलों की आग में,
पकी हुई लिट्टी की सोंधी स्वाद को,
भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

यूँ तो आज भी,
तारों से भरा आसमान देखता हूँ,
पर गर्मी की रात में,
छत पर बिछी हुई खटिया पे लेते हुए,
तारों को निहारना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

बरसात तो आज भी आती है,
और सड़कों पर पानी भी भरता है,
पर घर की चौखट पर बैठ कर,
सड़क पर पानी भरने का इंतजार करना,
और उस गंदे पानी के तेज बहाव में,
अपनी छोटी सी कागज की नाव को,
बहाना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

यूँ तो आज भी हर रोज़,
मैं औफिस जाता हूँ,
पर स्कूटर की पिछली सिट पर बैठ कर,
कभी-कभी दुकान जाने की,
उस उमंग को भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

जाती हुई रेलगाड़ियों को तो,
आज भी मैं देखता हूँ,
लेकिन दुकान पर,
ट्रेन की हार्न की आवाज़ सुनते ही,
नाना की गोद से उतर कर भागना,
और तालाब के किनारे से,
पटरी पर जाते हुए रेलगाड़ियों के डब्बे,
गिनना भूल जायूँगा,
ये सोच न था...

कभी-कभी आज भी,
कहीं किसी मन्दिर में,
बजती हुई भजन की आवाज़,
मुझे सुने देती है,
लेकिन घर के सामने वाले गुरुद्वारा से ,
आती हुई गुरुवाणी की आवाज़ से,
दिन की शुरुआत करना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

मन्दिर की सीड़ियों पे आज भी चढ़ता हूँ,
और भगवन के दर्शन करता हूँ,
लेकिन गुरुद्वारा में मिलाने वाले,
घी से लबालब आटे का हलुआ और चने की घुघनी का प्रसाद,
खाना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

औफिस में बैठे हुए कम के बोझ और आलस से,
अब भी दिन में हलकी झपकी आ जाती है,
लेकिन दोपहर के खाने के बाद,
रेडियो पर लोकगीत सुनते हुए,
चटाई पर सोना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

तकिये के बिना आज भी मुझे,
नींद नही आती है,
और कभी-कभी पेट के बल भी सो जाता हूँ,
पर,नाना की बांह पर अपना सर,
और उनके पेट पर अपना पैर चढाकर,
सोना भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

आज महीने के अंत में,
तनख्वाह मिलने की खुशी तो मुझे होती है,
लेकिन हर रोज सुबह,
मिलने वाली अठन्नी या,
एक रुपये का सिक्का से,
चेहरे पे आने वाली मुस्कान को भूल जाऊंगा,
ये सोचा न था...

आज भी मैं हँसता हूँ,
और दूसरो को भी हँसता हूँ,
लेकिन अपनी गोद में बिठा कर,
उंगली से गुदगुदा कर,
अब कोई मुझे नही हसांएगा,
ये सोचा न था...

मालूम है मुझे,
ज़िन्दगी स्थिर नही होती,
पर ज़िन्दगी के सुनहरे पल,
यूँ भूल जाऊंगा,
ये तो कभी भी सोचा न था...

-----------Neeraj Sharma----------




In the sweet memory of my Dearest "NANA". Please don't copy of this poem.